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विधायकों से बदसलूकी विशेषाधिकार हनन समझा जाए, वित्तमंत्री ने स्पीकर को लिखी चिट्ठी

विधायकों से बदसलूकी विशेषाधिकार हनन समझा जाए, वित्तमंत्री ने स्पीकर को लिखी चिट्ठी

द फॉलोअप/ रांची: 
विधायकों से बदसलूकी को विशेषाधिकार हनन के दायरे में लाने की मांग उठी है। झारखंड के वित्त, योजना एवं विकास, वाणिज्य कर तथा संसदीय कार्य मंत्री मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने रविवार को विधानसभा अध्यक्ष रबींद्रनाथ महतो को पत्र लिखकर विधानसभा की कार्य संचालन नियमावली में इसके लिए प्रावधान जोड़ने का सुझाव दिया है, जिसके तहत विधायकों के साथ जानबूझकर अपमानजनक या अशिष्ट व्यवहार करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई की जा सके।

अधिकारियों का व्यवहार सिर्फ शिष्टाचार का विषय नहीं
मंत्री ने कहा कि विधायक जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। वे सदन के भीतर विधायी दायित्व निभाने के साथ-साथ अपने निर्वाचन क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान के लिए सदन के बाहर भी अधिकारियों से संवाद करते हैं। ऐसे में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों का विधायकों के प्रति व्यवहार केवल शिष्टाचार तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे विधायिका की गरिमा, प्रतिष्ठा और विशेषाधिकार से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए।

जानबूझकर अपमानजनक व्यवहार को विशेषाधिकार हनन माना जाए
राधाकृष्ण किशोर ने संविधान के अनुच्छेद 194 का उल्लेख करते हुए कहा कि विधायकों को सदन के भीतर बिना किसी भय या दबाव के जनहित के मुद्दे उठाने का विशेषाधिकार प्राप्त है। उन्होंने कहा कि शिष्टाचार और विशेषाधिकार दो अलग-अलग विषय हैं। उनके सुझाव के अनुसार विधायक के प्रति जानबूझकर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना, सरकारी कार्यालय में असम्मानजनक व्यवहार करना, सदन या सदन के बाहर उठाए गए जनहित के मुद्दों को जानबूझकर नजरअंदाज करना और प्रोटोकॉल से जुड़े सरकारी निर्देशों का जानबूझकर पालन नहीं करना विशेषाधिकार हनन के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए।

फोन नहीं उठाने और पत्रों पर कार्रवाई नहीं होने की शिकायत
मंत्री ने पत्र में विधायकों की उन शिकायतों का भी जिक्र किया है, जिनमें अधिकारी उनके फोन नहीं उठाते या उनके पत्रों पर समय पर कार्रवाई नहीं करते। उन्होंने कहा कि विधायकों की ओर से कई बार यह मुद्दा राज्यपाल और सरकार के समक्ष भी उठाया जा चुका है। सरकार की ओर से अधिकारियों को जनप्रतिनिधियों के साथ सौजन्यपूर्ण व्यवहार करने के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं आया है।

शून्यकाल और ध्यानाकर्षण के सवालों के जवाब में देरी
किशोर ने विधानसभा अध्यक्ष की ओर से आयोजित उच्चस्तरीय बैठक का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शून्यकाल, ध्यानाकर्षण, आश्वासन और निवेदन के माध्यम से विधायकों द्वारा उठाए गए कई सवालों के जवाब समय पर नहीं मिलते हैं। उनके अनुसार कार्यपालिका का विधायिका के प्रति दायित्व कमजोर होना संसदीय व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है।

विधायकों पर भी समान नियम लागू हों
हालांकि, राधाकृष्ण किशोर ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तावित व्यवस्था केवल अधिकारियों और कर्मचारियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों पर भी समान नियम लागू होने चाहिए। यदि कोई विधायक किसी अधिकारी के साथ जानबूझकर गाली-गलौज या दुर्व्यवहार करता है, तो उसके खिलाफ भी विधिसम्मत कार्रवाई की जानी चाहिए। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच गरिमापूर्ण व्यवहार दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है।

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